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राजनीति के सावन की मची है ऐसी धूम, मंदिर में चढ़ते नहीं खिलते ऐसे फूल।।

हिमाचल प्रदेश में एक महिला नेत्री और युवा नेता का अंतरंग विडियो खूब वॉयरल हो रहा है, बताया जा रहा है कि दोनों एक ही पार्टी से संबंधित हैं और दोनों ही विवाहित भी हैं। इसी दौरान कल उत्तर प्रदेश के चांदपुर विधानसभा से भी खबर आई है कि वहां की विधायक का अश्लील वीडियो वायरल हुआ है, हालांकि महिला विधायक का कहना है कि उसे बदनाम किया जा रहा है, क्योंकि उक्त वीडियो में उसकी कोई हम शक्ल है ”वह नहीं”। पुलिस जांच कर रही है। पुलिस जांच में क्या होता है ये जांच का ही विषय है, पर जो जांच हमने की, दोनों घटनाओं के ऊपर तो उसमें तीन बातें साफ निकल कर आईं, पहली ये कि, दोनों घटनाओं का संबध राजनीतिक लोगों से है और दोनों लोग एक ही पार्टी से जुड़े हैं, दूसरा सबके सब बाल बच्चेदार हैं, तीसरी और सबसे अहम बात ये, कि दोनों ही वीडियो सहमति से बने हैं (अब ये ना सोचें के हमने कैसे जांच?), यानी कि कोई भी यह नहीं कह सकता के उनका वीडियो किसी ने चोरी से बनाया। खैर जो हुआ सो बुरा हुआ पर लोग तरह-तरह की कहानियां बना रहे हैं और कह रहे हैं कि, राजनीति में घटिया लोग होते हैं। लोगों का ये भी कहना है कि राजनीति में ऐसा होता ही है, जिस वज़ह से आज के दौर में राजनीति करने उतरीं सभी महिलाएं और पुरूष लोगों की निगाह में गलत हो गए। ये स्वाभाविक ही है जब आये दिन कुछ राजनेता या तो बलात्कार के केस में पकड़े जाते हैं या उनके संरक्षण में देह व्यापार में महिलाओं को धकेला जाता है या सरकारी गेस्ट हाउस में रंग-रलियां मनाते पकड़े जाते हैं, तो दाग तो लगना स्वाभाविक है। वो कहते हैं ना ”कोयले की दलाली में हाथ काले”। परंतु मेरा कहना है कि, दस्ताने पहन कर भी तो कोयले की दलाली कर सकते हैं? नहीं समझे? तो समझिए, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई महिला या पुरूष राजनीति में है या सांसद या विधायक या अन्य किसी पद पर है, तो तब तक उनके हाथ काले नहीं हो सकते जब तक वह दस्ताने खुद ना उतार दें, अर्थात वह स्वयं संबध बनाने के इच्छुक ना हों अथवा अति महत्वाकांक्षी और आगे निकलने की चाह ना हो। पर राजनीति में इस तरह की बातें होती क्यूं है? इसे भी समझना होगा। ये इसलिए होती हैं कि फिल्मी दुनियां के ग्लैमर के बाद यही एक दुनिया है जहां व्यक्ति एक बार किसी भी छोटे मोटे पद पर आ जाये तो पॉवर गेम की चकाचौंध में और राजनितिक तिलस्म में फंस जाता है, कारण ये कि आप सत्ता में चाहे हो या ना हों लेकिन पार्टी का प्रभाव तो होता है (खासतौर से राष्ट्रीय पार्टियों का) संवैधानिक रूप से। इसलिए सरकारी गैस्ट हाउसों का उपयोग राजनीतिक लोग खूब करते हैं क्योंकि जो मर्जी करो कोई बोलता नहीं, कैमरे लगे नहीं होते, कमरा किसी के नाम से और रहता कोई और है? आपको बता दूं भारत वर्ष के हर राज्य में जितने होटल होते हैं उतने ही सरकारी विभागों के गैस्ट हाऊस होते हैं लेकिन फिर भी होटल खूब कमाई करते हैं और गैस्ट हाउस अपना खर्च भी नहीं निकाल पाते। हालांकि कुछ राज्यों में अब गैस्ट हाउस की बुकिंग शुरू हो गई है पर फिर भी वहां राजनीतिक लोग ही ज्यादा जाते हैं (और बहुत कम ही होंगे जो अपने परिवार संग जाते हैं) गलत ना समझें, मेरा मतलब है कि अपनी टीम के साथ जाते हैं अब टीम में कौन है ये मुझे क्या पता? तो महानुभावों और प्रिय संगत जी, जो लोग सच में सही हैं, वो कही भी अपनी पहचान दर्ज करवा कर रूक सकते हैं, चाहे वहां कैमरे छोड़ कर मैन स्कैनर ही क्यों ना लगे हों। बाकी सब मोह-माया और क्षणिक सुख के लिए पाप करते हैं तो ऐसे लोगों का चलचित्र देख कर अपना अंतर्मन दुखी ना करें बल्कि हो सके तो अपना चरित्र ठीक रखें। क्योंकि हो सकता है कोई आपको भी गाना सुना दे ”तेरी दो टकेयां दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाये”। वैसे भारत में अब नौकरियां लाख की हो गई हैं और शॉवर मेरा मतलब, सावन हजार दो हजार में। जय भोले नाथ, सावन के शनिवार की शुभकामनाएं।

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