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हालाते कशमीर पर सच कीजिए बयां, तुम्हारे अपनों के खातिर ही हमारे अपनों ने दी है जां।।

कश्मीर में सुरक्षा के दृष्टिकोण तथा आतंकवाद के खिलाफ़ आपरेशन ऑल आऊट को सफल बनाने के लिए भारतीय सेना के दस हजार जवानों की तैनाती क्या हुई, लोगों ने उसे धारा 370 और 35 ए से जोडऩा शुरू कर दिया। पहले तो आप ये समझ लीजिए के ये धाराएं तब तक हट ही नहीं सकतीं, जब तक इसे हटाने का विधेयक जम्मू-कश्मीर विधानसभा पारित कर केन्द्र सरकार को नहीं भेजती नंबर एक? नंबर दो यदि भेज भी दे तो लोकसभा और राज्यसभा के दोनों सदनों में इसे पारित करना होगा। लेकिन ना तो जम्मू-कश्मीर में और ना राज्यसभा में, दोनों जगह ही भाजपा को बहुमत हासिल नहीं है, पर ( कांग्रेस और अन्य दलों की मूर्खता और बिकाऊ नेताओं की वजह से शायद आने वाले दिनों में ये संभव हो सकता है?)। खैर कश्मीरी नेता ये जानते हैं की केन्द्र सरकार ऐसे एक दम धाराएं फौज के जोर पर नहीं हटा सकतीं तो फिर क्या वज़ह है कि, फारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गिलानी व लोन गुट विरोध स्वरूप जनता को गुमराह कर रहे हैं? ये इसलिए विरोध कर रहे हैं के यदि कश्मीर से आतंकवाद खत्म हो गया और तो इन सबकी राजनीति खत्म हो जायेगी, क्योंकि ये वही लोग हैं जो पिछले चालीस-पचास सालों से कश्मीरियों के नाम पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को हवा देकर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं और कश्मीरी बेवकूफ बनते आ रहे हैं। आपको शायद ही पता हो तो बता दूँ, कि ये महबूबा जी जो बारूद के ढेर वाली बात कह रहीं हैं ना, इन्हीं की बहन रूबिया सईद को बचाने के लिए वर्ष 1989 में वी.पी सिंह सरकार ने पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा कर दिया था। इस में अहम बात ये है के जिस समय रूबिया सईद का अपहरण हुआ और आतंवादी रिहा किये गए, उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक़ अब्दुल्ला जी ही थे और सबसे हैरानी की बात ये भी है कि, महबूबा जी और रूबिया सईद के आदरणीय पिता जी श्री मुफ्ती मोहम्मद सईद भारत के पहले मुस्लिम गृह मंत्री भी थे। कुछ समझ आया आपको..? नहीं…? तो मैं समझाता हूँ, मेरी थ्योरी के हिसाब से ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ था, क्योंकि ये कैसे संभव है कि, भारत के गृहमंत्री की बेटी को उसके घर से महज पांच सौ मीटर से अगवा कर लिया जाए..? दूसरा ये कि, कश्मीर मुसलमान भाईयों ने अपनी ही बहन का अपहरण कैसे कर लिया? अपहरण किया तो एक खंरोच तक नहीं आई (क्योंकि, कश्मीर की जनता भड़क सकती थी ?) ये बात जनता नहीं जानती थी, कि अपने लोगों ने ही चाल चली पर तथ्यों से मुझे पता चला। इसके बाद जहां पर आतंकवादियो को रिहा किया गया वहां से चंद मिनटों में ही उनका पता नहीं चला कि वो कहां गायब हो गए जब के मुख्यमंत्री फारूक़ अब्दुल्ला जी के पास पुरा तंत्र था।

8 दिसंबर 1989 को शाम 3:30 मिनट पर रूबिया का अपहरण होता है और 13 दिसंबर शाम 7:00 बजे वो रिहा होती हैं बड़े आराम से और उसके दो घण्टे बाद आतंकवादी रिहा होते हैं। आपने कभी सुना है की अपहरणकत्र्ता अपनी मांग पूरी होने से पहले व्यक्ति को छोड़ दें? लेकिन इस केस में ऐसा हुआ और वो इसलिए के सब मिलीभक्ती थी। बात यहां भी खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी पर इसके बाद जो हुआ वो सबसे खतरनाक था। आतंकवादियों के रिहा होते ही कश्मीरी पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया और हमारे कश्मीरी पंडित भाईयों को या तो इस्लाम कबूल करने को कहा गया या कश्मीर छोडऩे को कहा गया फिर भी जो रहे उन्हें मार दिया गया और मुख्यमंत्री थे फारूक़ अब्दुल्ला तथा गृहमंत्री थे मुफ्ती मोहम्मद सईद। अब कश्मीर के सारे नेता मुझे जवाब दें कि, कमबख्तो तुम्हारी वजह से हमारे लोग मरे और उन्हें पलायन करना पड़ा। तुम्हें बचाने के लिए हमारे फौजी भाई जान दे रहे हैं, फिर तुम हिन्दोस्तान को कोसते हो? बार-बार पाकिस्तान से बात करने को कहते हो, कभी किसी एक कश्मीरी नेता ने पाकिस्तान को कहा के पहले UN TRUCE AGREEMENT, 13 अगस्त 1948 की पहली शर्त को माने? साला भारत के नेताओं को भी क्या कहूं, जिनको कुछ पता होता नहीं और सोने पे सुहागा हमारी जनता है, जो नौसिखियों को चुन कर संसद और विधानसभा में भेज देती है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि अधिकांश लोग ये नहीं जानते के UN ने शांति समझौते के तहत पहली बात जो कही थी पाकिस्तान को, वो ये थी के ”पाकिस्तान को POK से अपनी सेना हटानी होगी”। लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया आज तक। कश्मीरी नेताओं को पता है, पर वो इस बारे में कभी टीवी चैनलों पर या अखबारों में नहीं बोलते….. भले ही आप ना बोलो, पर मैं तो बोलूंगा चाहे आपके कानों पर जूं रेंगे या ना रेंगे (टकलों और गंजों को छोड़ कर)।
रविन्द्र सिंह डोगरा

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