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घर में नहा के आइए जरूरत नहीं हमाम की, नंगेपन पर उतरें क्यूं जब बात है इंसाफ की।।

पिछले दो दिनों में दिल्ली, मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में मिला कर तीन गैंग रेप हो चुके हैं लेकिन इन राज्यों के सत्तासीन विधायकों, सांसदों ने उफ्फ़ तक तो छोडि़ए ”चूं” तक नहीं की है। आज़म खां की टिप्पणी पर संसद के अंदर और बाहर नारी सम्मान पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मेरी बहनें शायद दो दिनों से छुट्टी पर हैं, एक तो आखिरी शानिवार और फिर इतवार। आज संसद फिर लगेगी आप देखना आते ही सारी महिला सांसद गैंग रेप पर हल्ला मचाने लगेंगी, (ऐसा सोच के खुश मत होना, ऐसा कुछ नहीं होगा)। इनकी तो छोडि़ए वो जो असहिष्णुता और मॉब लिंचिग पर बड़ी-बड़ी चिठ्ठियां प्रधानमंत्री को घर बैठे-बैठे भेज कर मीडिया में वाह-वाह लूटते हैं, उनमें से किसी एक ने भी महिला उत्पीडऩ पर सरकारों से कोई बात की ही नहीं कभी? लगता है शायद वह सब खुद ही डरते हैं कि कोई उन्हें ही ना फंसा दे (इतिहास का कोई पन्ना उठा कर), ”मी टू कैम्पेन” तो याद ही होगा आपको। विडंबना देखिए भारतीय राजनीति की और सरकारों द्वारा बनाये गए कानून की और हद देखिए चुने हुए सांसदो और विधायकों की, कि जहां महिला अपने ऊपर हुए अपराध को सरेआम बता रही है और अन्य प्रताडि़त महिलाएं भी बता रहीं हैं, कि एम.जे. अकबर ने उनके साथ क्या-क्या किया?, उनसे गवाह और सबूत मांगे जा रहे हैं और जिसके पास पुलिस तथा डाक्टरी रिपोर्ट सब कुछ है उसे न्याय नहीं देते? साक्षी महाराज उन्नाव रेप केस के आरोपी सेंगर से मिलने चले जाते हैं और कल ही पीडि़ता की गाड़ी को ट्रक टक्कर मार देता है, जिसमें पीडि़ता और वकील गंभीर रूप से घायल हैं। बिहार कांग्रेस के एक बड़े नेता देह व्यापार में कुछ वर्षों पहले पकड़े गए थे, पर साक्षी महाराज को भाजपा ने और कांग्रेस नेता को कांग्रेस ने कभी कुछ नहीं कहा। ना ही दोनों पार्टियों की मेरी सांसद बहनों ने कोई वक्तव्य दिया। तो क्या ये कहावत सही है कि, ”हमाम में सब नंगे हैं”? परंतु जहां तक मैंने पढ़ा और देखा है तो महिला और पुरूषों के हमाम अलग-अलग हुआ करते हैं, फिर चुप्पी क्यों? क्योंकि भईया, नहा धो कर सारे बैठते तो एक ही कक्षा में हैं। आजकल समझाना बेकार हो जाता है मैनें, हमाम में नहाने से मना किया, तो बजाए समझने के नेता बाथरूम में नहाने लगे एक साथ। बात को यूं भी समझें कि, जैसे स्कूल से गायब होने पर दूसरे सहपाठी को पता होता है और फिर उसके गायब होने पर पहले को पता होता है, पर दोनों मास्टर जी को कुछ नहीं बताते और ना ही किसी के घर पर, ठीक वैसे ही संसद में भी शायद हो रहा है? पता सबको है, पर अपनी-अपनी गलतियों को छुपाने के खातिर कुछ हैं जो चुप रहते हैं। गलतियां की हैं ना, तभी तो चुप हो या डर लगता है, वर्ना खुल कर बोलो दल बदलने क्यों जाते हो? मेरे साथ भी हुआ ऐसा कांग्रेस के लोगों ने कहा छोड़ दो ये सब काम हमारे साथ आ जाओ, नहीं तो पछताओगे, फिर भाजपा के लोगों ने कहा हमारी सरकार आयेगी तो तुम्हें देख लेंगे तब पुलिस भी तुम्हें नहीं बचा पायेगी, तुम पर केस लगवा देंगे वगैहरा-वगैहरा। पर मैं आज भी स्थिर-स्पष्ट और वैसे ही काम करता हूं और कहता हूं जैसा पहले था, कोई केस नहीं लगा ना कोई परेशानी दे पाया कोई। जानते हैं क्यों, क्योंकि अपने फायदे के लिए दूसरे का गला नहीं काटा मैंने, हजार महिलाएं जुड़ी पर किसी का शौषण नहीं किया, स्कूल कालेज की ढेरों छात्राएं अपने काम करवाने आतीं हैं, पर हमेशा दफ्तर में मिले ना कि होटल या गैस्ट हाउस में (बल्कि कईयों के काम किए पर मिले कभी नहीं) ना बुलाया, पेंशन, पैसा, जमीन, सरकार के पास रूका हुआ दस-दस लाख तीस सालों का बकाया परिवारों को दिलाया पर किसी से चवन्नी तक नहीं ली। तो फिर, कैसे कोई फंसा सकता है? जऱा सोचिये? और यही बात है कि, मैं मुखर हो कर गलत बात का विरोध करता हूं। अब आप लोग सोचिए कि जो सब कुछ जानते हुए भी गलत बात का विरोध नहीं करते, आखिर वो ऐसा क्यूं करते हैं? इस श्रेणी में केवल नेता ही नही, अधिकारी और कर्मचारी (महिला-पुरुष) दोनों आते हैं। देश के हालात पर बाते करने वालों पहले अपने अंदर तो झांको।
रविन्द्र सिंह डोगरा

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राजनीति के सावन की मची है ऐसी धूम, मंदिर में चढ़ते नहीं खिलते ऐसे फूल।।

हालाते कशमीर पर सच कीजिए बयां, तुम्हारे अपनों के खातिर ही हमारे अपनों ने दी है जां।।