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मैं भेजती हूं लानत उन ख़ामोशियों पर कल कहीं उनका भी हश्र मुझ सा ना हो, मैं जिंदा रह कर भी लड़ी और आज भी लड़ रही हूं, तुम कल भी मुर्दा थे और आज भी मुर्दा हो -उन्नाव पीडि़ता

धिक्कार है उन लोगों पर जो संसद में और बाहर और बड़े-बड़े मंचों से महिलाओं के हितों की बातें चीख-चीख कर करते हैं। पर आज एक बेटी सरेआम जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही है तब कोई कुछ नहीं बोल रहा, लानत्। वेंटिलेटर पर पड़ी हमारी बेटी आज सोच रही है, कि यदि किसी बड़े आदमी, बड़े घराने, बड़े नेता या मंत्री या बिजनेस मैन, कोई बड़ा शौमेन-वुमैन की बेटी के साथ ऐसा हुआ होता तो क्या होता..? वो सोच रही है, कि जब संसद में मात्र अभद्र टिप्पणी करने वाले के ऊपर स्त्री शक्ति ने हमला कर उसे माफ़ी मांगने पर मजबूर कर दिया, तो मेरे उपर हुए दैहिक शोषण पर सब खामोश क्यों हैं? उसका अंतर्मन इसी कौतूहल से जूझ रहा है, कि कांग्रेस की प्रवक्ता की बेटी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले को गिरफ्तार कर लिया था, फिर मेरे साथ जो अभद्रता जिस्मानी हुई उस पर आज सब क्यों चुप हैं? वेंटिलेटर या डाक्टरों का उसे एहसास नहीं उसे कोई दर्द नहीं चाहे कितनी सुइयां दवा की लगें, उसकी चुभन बस इतनी सी है, कि जब भाजपा की सांसद की गाड़ी के साथ-साथ चलने वाले बाईक सवार युवकों को हिरासत में लिया था, तो मेरे साथ कुकृत्य करने वाले को सज़ा क्यों नहीं? सोचते-सोचते वो थक गई है और उसे नींद आ रही है, पर फिर भी वो जाग कर इसलिए परेशान है कि, आने वाले समय में उसके जैसी बेटियों का होगा क्या? वो पड़े-पड़े कभी खुश होती है, कभी मुस्कुराती है, फिर शांत और फिर दु:खी हो जाती है, खुश होती है ये सोच कर कि, उसे उस दर्द से छुटकारा मिला जो रोज सामाज उसे देता था, मुस्कुराती है ये सोच कर के उसने तो दो वर्षों तक जिंदादिली दिखाई, लेकिन जो आज चुप हैं कल जब उनका समय आयेगा तो वह क्या करेंगे? वो शांत है, ताकि बची हुई सांसों को समेट कर कुछ और पल मूर्खों के लिए दुआ कर सके। दु:खी होती है ये सोच कर के बद्दुआ भी कैसे दे दूं, अपनी ही मां-बहनों को, जो आज सब देख कर मूक-बधिर हो गई हैं, क्या करुं कि इनका ज़मीर जाग जाये? वो पूरी हिम्मत के साथ उन पलों और क्षणों को याद कर रही है कि, कब-कब उसे किसने और क्या-क्या आश्वासन दिया, वो सारे लोग (नेता, मंत्री, पुलिस, अलग-अलग दलों के नुमाइंदे आदि)। उसके चेहरे पर कभी लाल, कभी पीला, कभी भगवा, कभी सफेद, कभी नीला, कभी हरा, कभी गुलाबी सभी तरह के रंग आ जा रहे हैं पर उसे तिरंगा कहीं नहीं दिखाई दिया, वो किसी एक रंग को नहीं, तिरंगे को लहराना चाहती है आज। ठीक उसी तरह जिस तरह आजादी के वक्त खुशी से देश में लहराया गया था? पर वो ऐसा नहीं कर पा रही है क्योंकि, उसे आजादी इस नारकीय जीवन से मिल जायेगी, परंतु इस घिनौने शारीरिक शौषण से आम जनमानस की बेटियों को भारत में कभी आज़ादी नहीं मिलेगी? यही सोचते-सोचते उसे नींद आ रही है और कुछ पलों या दिनों में शायद हमारी बेटी सदा के लिए गहरी नींद में सो जायेगी, पर सियासी गलियारों में सोये लोग नींद से कभी नहीं जागेंगे चाहे कितनी भी आवाज़ कर लो। वैसे इस मामले में कुत्ते इंसानों से काफी आगे हैं, जो जऱा सी भी आहट हो तो हरकत में आ जाते हैं। पर वाह! री सियासत आप सब तो ऐसे सोये के कुत्ते फक्र महसूस कर रहे हैं, कि वो इंसानो से कहीं ज्यादा अच्छे हैं। अब आप कितने अच्छे हो ये आप ही जानों, पर मैं तो रोज हर गलत बात पर भौंकूगा और समय आयेगा तो काटूंगा भी और चीर-फाड़ भी कर दूंगा। तब तक आप सब तमाशा देखो मुंह में दहीं जमा कर।

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